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Monday, November 26, 2018

जानिए पुष्कर मेले का प्राचीन इतिहास ||

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हिंदुओं के सभी देवी-देवता पूर्णिमा वाले दिन पुष्कर झील में एकत्र होते हैं। इसलिए इस जगह को बहुत पवित्र माना जाता है और यही वजह है कि इस मौके पर यहां भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और झील में स्नान करके ब्रम्हा मंदिर में दर्शन करते हैं। ब्रम्हा जी का एकमात्र मंदिर पुष्कर में ही है। ऐसा माना जाता है कि झील में नहाने से कई प्रकार के रोग, विकार भी दूर होते हैं। यहां तक कि महाभारत में भी पुष्कर का जिक्र मिलता है। पुष्कर भारत में सबसे पुराने शहरों में से एक है। अजमेर के पश्चिमोत्तर में स्थित, पुष्कर के शांत शहर पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए राजस्थान आते के हजारों लोगो के लिए एक पसंदीदा जगह है। 510 मीटर की ऊँचाई पर स्थित, पुष्कर तीन पक्षों पर छोटी पहाड़ियों से घिरा हुआ है। ‘नाग पहर’, शाब्दिक अर्थ नाग पहाड़ अजमेर और पुष्कर के बीच एक प्राकृतिक सीमा रूपों में हैं और यह ‘गुलाब उद्यान के रूप में’ जाना जाता है, प्रसिद्ध पुष्कर गुलाब का सार पूरी दुनिया में निर्यात किया जाता है। एक रोचक पौराणिक इतिहास के साथ, एक विरासत कालातीत वास्तु विरासत की एक आकर्षक शहर पुष्कर है।

पुष्कर मेला मूलत: पशुओं और साखतौर पर ऊंटों की खरीद-फरोख्त के लिए लगने वाला मेला है.साल में पांच दिन के लिए ये मेला लगता है.
पुष्कर मेले की शुरुआत के साथ ही यहां तीर्थ यात्रियों की भीड़ उमड़ने लगी है.

पुष्कर झील का इतिहास
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पुष्कर झील का इतिहास 4 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से है। हालांकि पुष्कर झील का सृजन कृत्रिम झील के रूप में 12 वीं शताब्दी में शुरू हुआ था जब लूनी नदी के उपर बांध बनाया गया था। कहा जाता है कि गुरु गोविंद सिंह ने झील के किनारे गुरु ग्रंथ साहिब का पवित्र भाषण दिया था।
अंबर, बूंदी, बीकानेर और जैसलमेर के राजपूत शासकों ने झील और इसके आसपास के मंदिरों के महत्व को बहाल करने के लिए बहुत मेहनत की। उसके बाद विभिन्न क्षेत्रों के कई राजाओं ने झील पर घाटों का निर्माण किया।

तीर्थ का सौंदर्य:


अजमेर से नाग पर्वत पार करके पुष्कर पहुँचना होता है। इस पर्वत पर एक पंचकुंड है और अगस्त्य मुनि की गुफा भी बताई जाती है। यह भी माना जाता है कि महाकवि कालिदास ने इसी स्थान को अपने महाकाव्य अभिज्ञान शाकुंतलम के रचनास्थल के रूप में चुना था। पुष्कर में एक तरफ तो विशाल सरोवर से सटी पुष्कर नगरी है तो दूसरी तरफ रेगिस्तान का मुहाना।

मेले के दिनों में पूरे पुष्कर को रोशनी से सजाया जाता है। राजस्थान के पारंपरिक एवं सांस्कृतिक नृत्य-गीत के अतिरिक्त देशी एवं विदेशी कलाकार भी अपनी कला का प्रदर्शन करते है। मेला स्थल से परे पुष्कर नगरी का माहौल एक तीर्थनगरी सरीखा होता है। कार्तिक में स्नान का महत्व भारतीय मान्यताओं में वैसे भी काफी ज्यादा है। इसलिए यहाँ साधु भी बडी संख्या में नजर आते हैं। सुबह का वातावरण बहुत ही स्वच्छ होता है। संध्या के समय मंदिरों के आँगन से आने वाली आरतियों की गूँज पूरे वातावरण को आस्था एवं शान्ति में डुबो देती है। इस छोटे से अंचल में ही पाँच सौ के आसपास मंदिर हैं, और जब किसी भी मंदिर की टालियाँ झालर शंख खड़ावल घंटियाँ बज उठती हैं तो उनका अनहत वाद्य हर नास्तिक के लिये चुनौती और हर आस्तिक के लिये गहन श्रद्धा का विषय बन जाता है। मंदिरों में आरती के समय विरेचित सुगंध प्रधान धूम्रों से सारा वातावरण सुरभित हो उठता है।
सैलानियों की इतनी बडी संख्या के बावजूद यहां के स्वरूप में खास परिवर्तन नहीं आया है। इसलिये इसका प्राकृतिक रुप अभी भी आकर्षक बना हुआ है। सफेद संगमरमरी सीढियों से चलकर पुराने साँचे में निर्मित ब्रह्मा मंदिर के पास ही ऊँचे टीले पर दिन ढ़लने से कुछ पहले कैमरामैन सूर्यास्त को कैद करने मुस्तैद मिलते हैं। और शाम से पहले की लाली में धूल उड़ाते ढोरों की लंबाती परछाइयाँ कुदरती चित्रकारी छायांकन का नायाब नमूना दिखलाती है।

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